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Indore Traffic: A Real Life Experience
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इंदौर के ट्राफिक का हाल जिस तरह हो रहा है, लोगों को चाहिए की वो आगे आयें और इसे सुधारने में मदद करें. लेकिन सडको पर जो दिखता है, उसे देखकर कुछ और ही विचार आता है. अख़बारों में रोज एक्सिदेंट्स, हादसों, सड़क के शिकारों का जिक्र पढ़कर भी इंदोरी नहीं सुधर रहा.

लोगों के इस बर्ताव को देखकर वह गाना याद आता है की "अब तो आदत सी है मुझको, ऐसे जीने की...". जब तक हम अपनी आदतें नहीं बदलेंगे, कुछ नहीं बदलेगा. चाहे नगर निगम कितने ही लाखों रुपये खर्च करदे मार्किंग करवाने के लिए, अगर हम लेन में चलना नहीं सीखेंगे तो क्या फायदा?

इन्हीं विचारों की कशमकश में मैंने सोचा क्यूँ न इंदौर ट्राफिक पर एक "एक्सपेरिमेंट" किया जाए. ये सोचकर, मैंने अपनी एक्टिवे निकली, और 3 दिनी प्रयोग पर निकल पड़ा. प्रयोग के पहले दिन, राजेंद्र नगर से विजय नगर तक के सारे सिग्नल तोड़कर, बिना चलन बनाये घर वापस आने का प्लान था. दुसरे दिन, एक भी सिग्नल नहीं तोडना, रेड लाइट पर रुकना, हर नियम का पालन करने का प्रयोग था.

आगे जो आप पढेंगे, ये उन्ही 2 दिनों का ब्यौरा है. १० और ११ दिसम्बर, इंदौर.


डे १ - पहला दिन:
राजेंद्र नगर से शुरू होकर, अन्नपुर्णा से काला घोडा, वहां से कलेक्टोरेट, जवाहर मार्ग, संजय सेतु, एम्.जी. रोड, रिगल, घंटाघर, पलासिया, इंडस्ट्री हाउस, ए.बी.रोड, भास्कर, विजयनगर, सयाजी, और फिर वापस पलासिया, एम्.जी.एम्., जी.पी.ओ., नवलखा, सपना-संगीता होते हुए कलेक्टोरेट का सफ़र - 1 घंटे में तय किया, जिसमे एक भी रेड लाइट पर  नहीं रुका. में ये सोचकर निकला था की कहीं किसी सिग्नल पर पकड़ा जाऊँगा, पुलिसवाला २०-५० रुपये मांगेगा तो उसका विडियो रिकॉर्ड करके सी.वी.सी की नयी वेबसाइट पर डालूँगा. मगर शायद इंदौर की ट्राफिक की प्रॉब्लम भ्रस्टाचार से ज्यादा बड़ी है. इसीलिए तो, किसी पुलिसवाले ने न तो रोका टोका, न ही चालान बनाया.  और specially मैंने ऐसा समय चुना था जब पुलिस चौराहों पर मौजिद हो. अब इसे मेरी अच्छी किस्मत कहिये या इंदौर के ट्राफिक की फूटी किस्मत, के कोई इंदौर के एक छोर से दुसरे तक बिना रेड लाइट पर रुके, नियमो की धज्जिया उड़ाता चला जाए, और न तो पुलिस, और न ही दुसरे नागरिक उस पर ऊँगली उठायें. बल्कि कई जगह तो यूँ हुआ की मुझे देखकर कई और लोग भी सिग्नल क्रास कर गए - लाल बत्ती में. ये है सच्चा इंदोरी जस्बा. साथ देने का. लाल लाइट में धीरे धीरे आगे खिसककर, सड़क के बीच आने का. फिर सामने वाले को हलकी सी स्माइल पास करना, ताकि वह भूल जाए उसका ग्रीन सिग्नल था. और बस, निकल गए रेड लाइट में. पुलिस वाला रोके, तो कह देंगे हम तो किसी शर्मा जी के सगे में हैं...नहीं माना तो वर्मा जी ट्राई कर लेंगे, वर्ना गांधीजी तो चलते ही हैं.
एक दो वन वे में भी घुसा, यू टर्न मना था तब भी लिया, हॉस्पिटल के सामने होर्न बजाये, रोंग साइड भी चला. फिर भी, भगवन और इन्दोरियों की कृपा से सही सलामत, बिना खर्चा किये घर आ गया.

डे २ - दूसरा दिन:
आज हमने सोचा, की नियम तोड़ने पर तो सबने साथ दिया. सारा इंदौर ही साथ था. आज, नियम का पालन करके देखे इंदौर क्या कहता है. उम्मीदे तो आखिर रखनी ही पड़ेंगी? तो हम निकले अपने घर से, एअरपोर्ट रोड होते हुए, चिमनबाग से GSITS, रेस कोर्स रोड, ए.बी.रोड, पलासिया, म.ग.मार्ग, राजवाडा, सराफा बाज़ार, जवाहर मार्ग, राजमोहल्ला, चन्दन नगर, कालानी नगर का सफ़र तय किया.
कुल मिलाकर ३ घंटे लगे. हर लाल सिग्नल पर रुके, जब तक ग्रीन नहीं हुआ, तब तक नहीं हिले.
सबसे मजे की बात यह है की इस बार, इन्दोरियों ने हमारा साथ छोड़ दिया. जब सिग्नल लाल होता, में रुकता. आस पास वाले तेजी से होर्न बजाकर निकल जाते. एक-दो नें तो गालिया भी दे दी रुकने के लिए. गनीमत थी की किसी ने पीछे के गाडी को टक्कर नहीं मारी. वही इंदोरी, जो कल तक साथ थे, आज बेगाने हो गए थे. उनको हमसे ज्यादा कही पहुँचने की फ़िक्र थी. इस फ़िक्र, और जल्दी में भूल गए की उस और से भी तो गाड़िया आ रहीं है. उन्हें भी तो जल्दी है. "राइट ऑफ़ वे" यानि रस्ते पर अधिकार तो पहले उनका है, फिर हम बीच में कैसे घुस जाएँ? लेकिन जल्दी में इतना ध्यान कहाँ रहता है? वोह तो तब शायद ध्यान आये जब टक्कर हो जाए, पैर में प्लास्टर हो, हॉस्पिटल में हों...और फिर डॉक्टर कहे, की जल्दी नहीं आराम से १-२ हफ्ते रूककर जाना.
बहुत ज्यादा सर्कास्टिक हो गया शायद. मुद्दा ही ऐसा है. अगर आपने १ तारीख से हेलमेट लगा भी लिया, तो क्या उखाड़ लोगे? जब तक की हम सही-गलत में फर्क, और नियम, कायदे का महत्व नहीं समझेंगे, कुछ नहीं बदलने वाला.

रास्ते में एक चक्कर जब नारायण बाग़ का काटा, तो नारायण बाग़ से राजवाडा आने वाले रस्ते पर हम रेड लाइट पर रुक गए. लाइट ग्रीन हुई, तो हम निकल चले...और तभी एक नगर सेवा ने, लेफ्ट से आके मेरी स्कूटी पर टक्कर मार दी. मैंने गाडी स्टैंड पर लगाई , उतरा, और ड्राईवर को प्यार से बोला, "भैया दिखता नहीं क्या, रेड लाइट है आपकी". "अरे भिया, वह लाइट तो बंद है..उसको देखके कौन चलता है?". अब में क्या कहता? मुझे तो सामने दोनों लाइटें सही दिख रही थी. खैर, वहां से आगे बढ़कर जब राजवाडा पहुंचा तो एक जनाब अपनी नगर सेवा को टर्न कर रहे थे, और पीछे २०-२५ लोग होर्न बजा रहे थे. थोडा और आगे, जवाहर मार्ग पर एक सज्जन सब्जी वाले को रोककर , अपनी बाइक बीच सड़क पर लगाकर, सब्जी ले रहे थे..

कालानी नगर चौराहे पर एक भाईसाब नें जरूर मेरा साथ दिया. में रेड लाइट पर रुका. आस-पास के दो तीन लोग "ओये" "भियो" कहते हुए सिग्नल क्रोस कर गए. तभी एक भाईसाब अपनी वाइफ के साथ एक्टिवा पर आये..सिग्नल पे रुक गए. फिर उतरे, वाइफ के हाथ से बैग लिया. वाइफ को गाडी से उतारा. डिक्की में बैग रखा. (अब सिग्नल ग्रीन हो गया है..लेकिन में भी उत्सुकता से देख रहा था इनको) , बैग रखकर, वाइफ को गाडी पर बिठाकर, फिर चल दिए. अब बताये, निगम ने सडको को चौड़ा करके आस पास इतनी जगह बनाइ है, पर फिर भी ये रेड लाइट पर ही "स्विच" कर रहे हैं.

अंततः, मेरा प्रयोग तो पूरा हुआ. और निष्कर्ष यह निकला की इंदोरी किस और इंदोरी को देख कर नहीं सुधर सकता. न ही शायद किसीके बोलने, समझाने पर सुधरे. तरीका है की उन्हें या तो खुद इस बात का एहसास हो, या एहसास जबरदस्ती कराया जाए. अगर मेरे सिग्नल क्रास करने के प्रयोग में राजवाडा पे मुझसे पुलिस ने ५००/- रूपये की रसीद कटा दी होती, तो शायद में सयाजी तक सिग्नल नहीं तोड़ता.

आप खुद समझदार हैं, यदि आप अपने "राइट ऑफ़ वे" का पालन नहीं करेंगे, तो कौन करेगा? यदि आप इंदौर के ट्राफिक को नहीं सवारेंगे, तो कौन सवारेगा?

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